शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

(children story) गर्वाहरण


     कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के अधिपती थे। तेनालीराम जैसे अनेक विद्वानों को उनके दरबार में आदरणीय स्थान था। 
एक दिन एक महापंडित उनके दरबार में आये। उन्हे उनके पांडित्य का बड़ा गर्व था।दरबार में उनका वर्तन बहुत ही अहंकारी था। सौ शिष्यों के साथ वे दरबार में पदारे थे और आते ही पहला सवाल किया,"मेरे साथ शास्त्रार्थ करने की योग्यता दरबार के किस के पास है?" दरबार में सन्नाटा छा गया। तभी तेनालीराम कह उठा,'मैं कल आप के साथ शास्त्रार्थ करने के लिए तयार हूँ।'
दुसरे दिन वो महापंडित दरबार में आने से पहले ही तेनालीराम सब तैयारी कर के दरबार में आ पहुँचा। वे एक बड़ा सा ग्रंथ लेकर आसन पर बैठ गये। उनके पास बैठे विद्वानों के साथ चर्चा करने लगे। 

इतने में महापंडित वहाँ आ गये। तेनालीराम से उन्होंने पूछा," किस बात पर चर्चा हो रही है?"
तेनालीराम विनम्रता से कहने लगे,"मैं इन्हें 'तिलकाष्ठमहीषबंधन' इस ग्रंथ का दर्शन समझा रहा हूँ। आप को यह ग्रंथ तो मालूमही होगा...."
महापंडित उनके जीवन में पहिली बार इस ग्रंथ का नाम सून रहे थे। 'मालूम नहीं' कह दिया होता,तो उनकी असफलता उजागर हो जाती थी।इसलिए उन्होंने कहा," मेरा इस ग्रंथ पर गाढ़ा अभ्यास है।" इस पर तेनालीराम ने कहा," तो चलिए, हम इसी ग्रंथ पर शास्त्रार्थ करेंगे।" यह सुनकर महापंडित घबरा गये। "आज मेरे पेट में दर्द हो रहा है। हम कल इस पर शास्त्रार्थ करेंगे। ऐसा कहकर वो दरबार से चले गये। उन्होंने वो ग्रंथ ढूँढ़ने का बहुत प्रयास किया,पर उन्हें नहीं मिला। वो सबेरे जल्दी ही उठकर राजधानी छोड़ चला गया।
तेनालीराम की हुशारी पर महाराजा को गर्व महसूस हुआ। महाराज ने उसे इस बारे में पूछा। तेनालीराम ने कहा,"विद्वत्ता और अहंकार कभी भी एक जगह नहीं रह सकते। मैं उस महापंडित को देखते ही पहचान गया था। असल में 'तिलकाष्ठमहीषबंधन' ऐसा कोई ग्रंथ ही नहीं है। उसने ग्रंथ के उपर ढका हुआ कपड़ा निकाल दिया। उस में  तिल की लंबी लकड़ियाँ थी,जिसे एक धागे से बाँधा गया था।

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